ITAT Decision - Property Cash Payment Allegations

प्रॉपर्टी खरीद में 'कैश पेमेंट' का आरोप?

आयकर विभाग केवल थर्ड-पार्टी दस्तावेजों के भरोसे नहीं लगा सकता टैक्स: ITAT का बड़ा फैसला

क्या आयकर विभाग किसी प्रॉपर्टी खरीदार पर सिर्फ इसलिए टैक्स देनदारी या पेनाल्टी लगा सकता है, क्योंकि किसी बिल्डर या तीसरे व्यक्ति के यहाँ छापे (Search) के दौरान मिले दस्तावेजों में कैश पेमेंट (On-Money) का जिक्र है? इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल (ITAT) की मुंबई बेंच ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए साफ किया है कि विभाग ऐसा बिल्कुल नहीं कर सकता।

ट्रिब्यूनल ने अपने आदेश में कहा कि अगर टैक्स डिपार्टमेंट के पास खरीदार के खिलाफ कोई स्वतंत्र और ठोस सबूत नहीं है, तो केवल किसी तीसरे पक्ष (Third-Party) से जब्त किए गए कच्चे पर्चों या एक्सेल शीट्स के आधार पर टैक्स डिमांड पैदा नहीं की जा सकती।

क्या था पूरा मामला? (The Case Story)

यह मामला करदाता संजीत कुमार केदारनाथ गुप्ता से जुड़ा हुआ था। उन्होंने अपने भाई के साथ मिलकर एक रियल एस्टेट डेवलपर (GNP गैलेक्सी फेज I) से एक कमर्शियल यूनिट खरीदी थी। इस प्रॉपर्टी की रजिस्टर्ड वैल्यू (Agreement Value) ₹50 लाख थी।

कुछ समय बाद, आयकर विभाग ने संबंधित बिल्डर के यहाँ छापेमारी की। वहां मिले एक्सेल शीट्स के आधार पर आयकर अधिकारी (AO) ने निष्कर्ष निकाला कि खरीदार ने ₹90 लाख का अतिरिक्त भुगतान 'नकद' में किया था। इसके आधार पर विभाग ने अघोषित आय (Undisclosed Income) जोड़ते हुए टैक्स नोटिस थमा दिया।

ITAT ने फैसले में क्या कहा? (The ITAT Order)

स्वतंत्र सबूतों की कमी: आयकर विभाग यह साबित करने के लिए कोई भी स्वतंत्र या पुख्ता सबूत (Independent and Corroborative Evidence) पेश नहीं कर सका कि खरीदार की तरफ से वास्तव में ₹90 लाख का नकद भुगतान किया गया था।
डंब डॉक्युमेंट्स (Dumb Documents): किसी तीसरे पक्ष के यहाँ से मिली एक्सेल शीट या कच्चे पर्चे जिन पर न तो खरीदार के हस्ताक्षर हों और न ही कोई स्पष्ट विवरण, उन्हें कानूनी तौर पर 'डंब डॉक्युमेंट्स' माना जाता है।
केवल इनके दम पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला: ITAT ने माननीय सर्वोच्च न्यायालय के Common Cause vs Union of India और CBI vs V.C. Shukla जैसे ऐतिहासिक मामलों का हवाला दिया, जिसमें स्थापित किया गया है कि निजी डायरी के कच्चे आंकड़े पुख्ता सबूत नहीं होते।

करदाताओं के लिए यह फैसला क्यों मायने रखता है?

अक्सर बिल्डर के यहाँ छापे पड़ने पर संपत्ति खरीदने वाले आम करदाताओं को भी नोटिस भेज दिए जाते हैं। इस फैसले से निम्नलिखित राहत मिलती है:

मनमाने टैक्स असेसमेंट पर रोक: विभाग अब किसी तीसरे पक्ष के बयानों या अधूरे कागजातों के आधार पर आप पर भारी टैक्स या जुर्माना नहीं थोप सकता।
साबित करने की जिम्मेदारी (Burden of Proof): यदि विभाग आरोप लगाता है, तो उसे साबित करने की प्राथमिक जिम्मेदारी खुद आयकर विभाग की होगी।
क्रॉस-एग्जामिनेशन का अधिकार: यदि विभाग किसी तीसरे पक्ष के बयान का इस्तेमाल करता है, तो आपको उस पक्ष से पूछताछ करने का पूरा अधिकार है।

निष्कर्ष (Conclusion)

ITAT मुंबई का यह आदेश करदाताओं के अधिकारों की रक्षा की दिशा में एक बड़ा कदम है। हालांकि, हमेशा ध्यान रखें कि सभी वित्तीय लेनदेन बैंकिंग चैनलों (चेक, नेट बैंकिंग, या UPI) के माध्यम से ही हों। भविष्य में विभाग की परेशानी से बचने के लिए आप इस कानूनी फैसले का संदर्भ ले सकते हैं।